और बज उठी मंदिर की घंटी (हेमा शर्मा)


मंदिरों के कपाट खुलने से श्रद्धालुओं के मन में खुशी और संतोष दोनों की भावना है, क्योंकि मंदिर में जाकर पूजा करना हम हिन्दुस्तानियों के लिए ठीक उसी प्रकार है, जैसे ईश्वर के घर जा कर उनके रूबरू बैठ कर उनसे बात करना हो, हर दूसरा शख्स भगवान की मूर्ति के सामने बोल कर ही अपने सुख और दुख व्यक्त करता है। आज मंदिर में पूजा करना तो भले ही संभव हो गया है, परंतु मंदिर जाकर किसी चीज को छूने पर सख्त पाबंदी है, यहां तक कि मंदिरों की घंटियों को भी बांध दिया गया है, जिससे कि किसी भी तरह का इंफैक्शन न फैल पाए, जिससे कि श्रद्धालुओं को अपनी पूजा में कुछ अधूरापन जरूर महसूस हो रहा है, परंतु वक्त की नजाकत को समझते हुए लोग उस दिन के इंतजार में हैं, जब कोविड-19 देश को अलविदा कह देगा और हम सब सुरक्षित हो जाएंगे।
ऐसे में मध्य प्रदेश के मंदसौर के नाहरू खान जो कि 68 साल के हैं, ने भी मंदिरों की घंटियों की आवाज की कमी को महसूस किया, क्योंकि मधुर ध्वनि में बजती ये घंटियां पूरा वातावरण पवित्र और सकारात्मक बना देती हैं। उन्होंने सैंसर से घंटी बजाने पर काम शुरू किया, जिसमें घंटी को छूने की जरूरत नहीं है, तीन दिन की मेहनत के बाद उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर में ऐसा सेंसर लगाया, जिसके नीचे हाथ और चेहरा दिखाने पर घंटी अपने आप बजने लगती है।
इस समय मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर शायद देश का पहला ऐसा मंदिर है, जहां सैंसर से घंटियां बज रही हैं तथा मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है, हो सकता है कि आने वाले समय में देश के बाकी मंदिरों में भी इसी तरह से पूजा की घंटियों की आवाज गूंजने लगे।
यदि ऐसा होता है तो आने वाले समय में पूजा करने के तरीकों में भी काफी बदलाव आएगा और घंटियां भी इसी तरह से बजने लगेंगी अर्थात पूजा में आपकी आस्था दूर से प्रणाम करने से ही व्यक्त हो पाएगी, आप ईश्वर को छू कर प्रणाम नहीं कर पाएंगे।
हेमा शर्मा, चंडीगढ़

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